मुट्ठी भर खुशियाँ
आज कल पाँव जमी पर नहीं पड़ते मेरे
खुशियाँ फैली है फ़िजाओ में शाम सवेरे
जी करता है कैद कर लू मुट्ठी में इन खुशियों को
न खोलू अपनी खुशियों भरी मुट्ठी को
पंछी की तरह उड़ जाएगी खुशियाँ सवेरे
न कैद कर पाओगे इन खुशियों को
खुशियाँ तो बनी है शाम को आने को
और सुबह में पंछी की तरह उड़ जाने को
खुशियाँ फैली है फ़िजाओ में शाम सवेरे
जी करता है कैद कर लू मुट्ठी में इन खुशियों को
न खोलू अपनी खुशियों भरी मुट्ठी को
पंछी की तरह उड़ जाएगी खुशियाँ सवेरे
न कैद कर पाओगे इन खुशियों को
खुशियाँ तो बनी है शाम को आने को
और सुबह में पंछी की तरह उड़ जाने को


Lovely composition.. :)
ReplyDeleteThank you Mohi.
ReplyDeleteBeautiful lines...:)
ReplyDeleteThank you Jeny.
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना.. आपके ब्लॉग पर पढने को बड़ी अच्छी-अच्छी रचनायें मिलीं.. लिखते रहिये.. बधाई.. anilavtaar.blogspot.com
ReplyDeleteahhhhaaa..... ye to pyaar ka ehsaas bayaan kr rha hai..... *atisundar rachna*
ReplyDeleteधन्यवाद अनिल अवतार जी...
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